Breaking

Gen-Z की नब्ज समझ गए मोहन भागवत? जानिए कैसे युवा पीढ़ी और BJP के बीच मजबूत पुल बना RSS

 नई दिल्ली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वैचारिक रिश्तों के बीच, संघ प्रमुख मोहन भागवत का हर एक बयान सियासी गलियारों में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जाता है. संघ प्रमुख जब कभी कोई बात कहते हैं तो कभी-कभी बीजेपी की नीतियों के समर्थन के तौर पर देखा जाता है तो कभी लगता है कि किसी बदलाव या सुधार का संकेत है। 

संघ प्रमुख मोहन भागवत का मुंबई में गुरुवार को Gen-Z’ और ‘Gen-अल्फा’ यानी नई युवा पीढ़ी के साथ उनकी बातची सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करने वाला एक गहरा वैचारिक संदेश है. Gen-Z की साथ संवाद के दौरान मोहन भागवत के जवाब, भाषा का चुनाव और बॉडी लैंग्वेज अहम संकेत थे। 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन खत्म होने के दो हफ्ते बाद युवा पीढ़ी के साथ उनकी बातचीत क बड़ा संकेत है. बीजेपी छात्रों-युवाओं के नब्ज को समझने में नाकाम रही है, आरएसएस ने उसे बाखूबी समझते हुए युवा पीढ़ी को साधने की कोशिश शुरू कर दी है।

संघ प्रमुख का Gen-Z के साथ संवाद
संघ प्रमुख का यह आउटरीच इवेंट उन छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों के बाद हुआ है, जिन्होंने बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से बढ़ती दूरी को उजागर किया, जो अब सत्ता से सवाल पूछने, जवाब मांगने और अपनी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरने के लिए तैयार है. मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में संघ प्रमुख ने युवाओं के साथ संवाद किया. भागवत  शायद ही कभी अंग्रेज़ी में बोलते हों, लेकिन गुरुवार को Gen-Z के साथ संवाद में उसी अंदाज, अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में बातचीत कर रहे थे। 

युवा पीढ़ी की शिकायतों को संघ प्रमुख ने सुना और बकायदा माना भी. उन्होंने छात्रों के विरोध करने के अधिकार का बचाव किया. साथ ही इस बात को भी खारिज कर दिया कि विरोध करने वाले युवा ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दिया जाए. भागवत ने बेरोज़गारी, शिक्षा और आरक्षण के मुद्दे पर बात की. सबसे अहम बात यह रही कि उन्होंने युवा पीढ़ी के बारे में एक बुनियादी बात समझा कि यह सवाल पूछती है और बदले में तार्किक जवाब की उम्मीद करती है। 

संघ ने असहमति को देशद्रोह नहीं माना
संघ प्रमुख मोहन भागवत का छात्रों के साथ संवाद के दौरान सबसे अहम राजनीतिक कदम यह था कि उन्होंने असहमति को देशद्रोह नहीं माना. संघ प्रमुख ने कहा कि अगर Gen-Z विरोध कर रहा है,तो यह देश-विरोधी नहीं है. वे हमारे अपने ही लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि Gen Z और Gen-अल्फा मौजूदा पीढ़ी से ज़्यादा ईमानदार हैं, देशभक्ति हैं और सेवा करने का जज्बा रखते हैं। 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन के दौरान कई बीजेपी नेताओं ने जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की, उससे संघ प्रमुख की बातों की तुलना करते हैं, तो ज़मीन-आसमान का फ़र्क दिखता है. प्रदर्शनकारियों को तरह-तरह से बुरा-भला कहा गया, जैसे कि वे उपद्रवी हैं, अराजकता फैलाने वाले हैं, राजनीतिक मकसद से ऐसा कर रहे हैं, ‘भारत-विरोधी’ इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। 

तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सीजेपी को उपद्रवी तत्वों की बी-टीम बताया था तो बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने प्रदर्शनकारियों पर ‘अराजकता’ फैलाने का आरोप लगाया. वहीं, पार्टी नेता जयवीर शेरगिल ने आरोप लगाया कि NEET आंदोलन को ‘भारत-विरोधी अराजकतावादी’ गिरोह ने हाईजैक कर लिया है. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी आंदोलन के मकसद और ‘भारत-विरोधी ताकतों’ के साथ कथित संबंधों पर सवाल उठाते हुए निशाना साधा था। 

राजनीतिक पार्टियां अक्सर विरोध प्रदर्शन और आंदोलनों को टारगेट करती हैं, जो उन्हें चुनौती देते हैं. बीजेपी के लिए समस्या सिर्फ़ यह नहीं थी कि उसके कुछ नेताओं ने विरोध प्रदर्शनों की आलोचना की, समस्या यह थी कि यह आलोचना अक्सर प्रदर्शनकारियों के बारे में पहले से बनी धारणाओं पर आधारित होती थी,न कि उस शिकायत को समझने की कोशिश पर, जिसके कारण वे सड़कों पर उतरे थे. बीजेपी नेताओं के उल्टे मोहनभागवत ने बिल्कुल अलग सोच के साथ शुरुआत की। 

विरोध का अधिकार और लोकतंत्र का सबक
संघ प्रमुख भागवत ने यह नहीं कहा कि Gen-Z और युवा पीढ़ी को विरोध करना बंद कर देना चाहिए. उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि विरोध भी लोकतांत्रिक बातचीत का एक तरीका हो सकता है. उन्होंने कहा कि विरोध भी बातचीत का एक ज़रिया है और तर्क दिया कि जब संवाद और बातचीत नहीं होती, तो विरोध मुद्दों को चर्चा में लाने का एक तरीका बन जाता है. संघ प्रमुख के द्वारा किया गया यह फ़र्क मायने रखता है। 

मोहन भागवत विरोध करने वालों के हर तरीके का समर्थन नहीं कर रहे थे. उन्होंने खास तौर पर डॉ.भीमराव अंबेडकर का ज़िक्र करते हुए कहा कि आंदोलन करने के कुछ तरीके होते है, लेकिन यह बात भी तब कही, जब उन्होंने यह मान लिया था कि युवा इसलिए विरोध कर रहे थे, क्योंकि उन्हें अपनी जिंदगी में असल समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। 

भागवत ने कहा कि आंदोलन को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए और उसका समाधान किया जाना चाहिए. संघ के लिए  राजनीतिक रूप से यह काम का फ़र्क है, यह किसी शिकायत की जायज बात को विरोध के दौरान की गई हर कार्रवाई की जायज बात से अलग करता है। 

सीजेपी आंदोलन के दौरान बीजेपी की प्रतिक्रिया ने अक्सर इसी फ़र्क को धुंधला कर दिया. नतीजा यह हुआ कि परीक्षा में गड़बड़ियों और NEET-UG पेपर लीक को लेकर शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे एक बड़ी बहस में बदल गया कि क्या युवा भारतीयों को सरकार के सिस्टम पर सवाल उठाने का अधिकार है भी या नहीं। 

जब तक केंद्र सरकार बातचीत के लिए आगे बढ़ी और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की अहम राजनीतिक मांग को माना, तब तक विरोध का महत्व उसकी शुरुआती वजह से कहीं ज़्यादा बढ़ चुका था। 

Gen Z को भागवत ने कैसे समझा
भागवत की यह बात कि आज के युवा ‘सवाल पूछते हैं’, शायद गुरुवार को मुंबई में हुई उनकी बातचीत का सबसे अहम हिस्सा थी. संघ प्रमुख ने संवाद के दौरान कहा कि जब हम लीडरशिप के बारे में सोचते हैं, तो मन में एक तस्वीर बनती है- कोई व्यक्ति सामने खड़ा है, वो भाषण दे रहा है, चुनाव जीत रहा है और लोगों को उपदेश दे रहा है, असल में ऐसा होता नहीं होता.’ उन्होंने कहा कि असली लीडर अंदर से काम करते हैं और मिसाल कायम करके नेतृत्व करते हैं। 

संघ प्रमुख की यह उस पीढ़ी से बातचीत करने के लिए लगभग एक गाइड की तरह है, जो ऐसे माहौल में बड़ी हुई है, जहां राजनीतिक भाषणों की तुरंत फैक्ट-चेकिंग होती है, उनके क्लिप बनाए जाते हैं, उन्हें ऑनलाइन ट्रोल किया जाता है और उन पर सवाल उठाए जाते हैं। 

Gen-Z युवा पीढ़ी जरूरी नहीं कि सरकार विरोधी हो. यह युवा पीढ़ी तेजी से ‘पेटरनलिज़्म’ (अभिभावक की तरह हुक्म चलाने की सोच) के खिलाफ हो रही है. भागवत के भाषण में भी इस बात पर ज़ोर दिया गया. यह पीढ़ी इस बात को बिना सोचे-समझे नहीं मानती कि सिर्फ़ इसलिए किसी की बात मानी जानी चाहिए, क्योंकि वह सत्ता में है। 

यह युवा पीढ़ी पूछती है ‘क्यों?’,  इसे सबूत चाहिए, इसे जवाबदेही चाहिए, और जब उसे लगता है कि संस्थागत तरीकों से जवाब नहीं मिल रहा है, तो वह इस मुद्दे को लेकर विरोध करती है और सार्वजनिक मंच पर ले जाना ज़्यादा बेहतर समझती है.  ऐसा लगता है कि भागवत ने Gen Z और Gen-अल्फा की सोच और तौर-तरीके को समझ लिया है. इसीलिए संघ प्रमुख उन्हीं के अंदाज में जवाब देते नजर आए। 

बीजेपी के लिए संघ बनता रहा संकटमोचक
मोहन भागवत का दखल आरएसएस-बीजेपी के रिश्तों के एक पैटर्न का हिस्सा है, जब कभी भी संघ को लगता है कि बीजेपी भटक गई है, गलत आकलन किया है या बड़े सामाजिक वर्ग से उसका संपर्क टूट गया है, तो वह अपनी सार्वजनिक भाषा के ज़रिए असंतोष जाहिर करता रहा है. इसका सबसे ताजा उदाहरण 2024के लोकसभा चुनाव के बाद देखने को मिला था।  

लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि पार्टी उस दौर से आगे निकल चुकी है जब उसे आरएसएस की ज़रूरत पड़ती थी और अब वह अपने कामकाज खुद संभालने में सक्षम है, नड्डा ने कहा था कि आज हम बढ़ गए हैं, सक्षम हैं, इसलिए बीजेपी खुद को निर्णय लेती है। 

संघ ने इस असहमति को सार्वजनिक टकराव में नहीं बदला. इसके बजाय उसकी प्रतिक्रिया हमेशा की तरह संयमित रही. आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इसे पारिवारिक मामला बताया और कहा कि ऐसे मामलों को परिवार के भीतर ही सुलझाया जाता है, न कि सार्वजनिक मंचों पर उन पर चर्चा की जाती है, लेकिन जून 2024 में चुनाव के बाद भागवत की टिप्पणियों ने संघ की उम्मीदों की ओर ज़्यादा साफ़ इशारा किया था। 

संघ प्रमुख ने चुनाव प्रचार के दौरान विनम्रता और मर्यादा की कमी के बारे में बात की और ज़ोर दिया कि विपक्ष को सिर्फ़ दुश्मन नहीं माना जाना चाहिए. यह संदेश छोटा था लेकिन साफ़ था, यह एक स्पष्ट संकेत था कि चुनावी ताकत संयम, विनम्रता और सामाजिक जुड़ाव की ज़रूरत को खत्म नहीं करती। 

आरएसएस ने दूरी बनाए रखी और आम चुनाव में बीजेपी की पूरी तरह से मदद नहीं की. इसका नतीजा था कि लोकसभा में बीजेपी को अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा सकी, जिसके बीजेपी और वैचारिक संगठन के बीच संबंधों पर बहस और तेज़ हो गई. मुंबई में Gen-Z और Gen-अल्फा के बारे में मोहन भागवत की टिप्पणियों में भी कुछ ऐसा ही संदेश छिपा है। 

उन्हें बीजेपी के नाम लेने की ज़रूरत नहीं है, उन्हें यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि सरकार की प्रतिक्रिया गलत थी. उन्हें पूरे विरोध-प्रदर्शन का समर्थन करने की भी ज़रूरत नहीं है. यह कहकर कि Gen Z देश-विरोधी नहीं है,उनकी शिकायतें जायज़ हैं, विरोध लोकतांत्रिक बातचीत का हिस्सा है, और युवाओं को प्यार के साथ-साथ जवाबों की भी ज़रूरत है, वे इस पीढ़ी के साथ जुड़ने का एक तरीका बता रहे हैं। 

मुंबई में भागवत की बातचीत को सिर्फ़ एक आम बातचीत नहीं माना जाना चाहिए. यह उन लोगों तक पहुंचने की एक कोशिश थी, लेकिन इसमें अपनी दिशा या तौर-तरीके सुधारने की बात भी शामिल थी.संघ प्रमुख ने ‘जेन Z’ से सवाल पूछना बंद करने के लिए नहीं कहा. उन्होंने उनसे कहा कि सवाल पूछना उनकी पीढ़ी के स्वभाव का हिस्सा है। 

संघ प्रमुख ने युवा पीढ़ी से यह नहीं कहा कि विरोध करने से वे देश-विरोधी बन जाते हैं, उन्होंने कहा कि विरोध करने वाले भी देश का ही हिस्सा हैं. इस तरह से उन्होंने अपनी बात सरकार का बचाव करते हुए शुरू नहीं की, बल्कि लोगों की शिकायतों को मानते हुए शुरुआत की. यही वजह है कि मुंबई के उस कमरे से बाहर भी उनकी बातों का असर हुआ। 

 

 

Habulal Sharma

Habulal Sharma

Writer & Blogger

All Posts
Previous Post
Next Post

Would You Like To Read..

  • All Posts
  • एजुकेशन एंड जॉब
  • खेल
  • टॉप न्यूज़
  • दुनिया
  • देश
  • धर्म
  • बिजनेस
  • बॉक्स ऑफिस
  • राजस्थान
  • लोकल मार्केट

ताज़ा खबरे

  • All Posts
  • एजुकेशन एंड जॉब
  • खेल
  • टॉप न्यूज़
  • दुनिया
  • देश
  • धर्म
  • बिजनेस
  • बॉक्स ऑफिस
  • राजस्थान
  • लोकल मार्केट

© 2025 | All Rights Reserved | Sachreport.com | Developed By Best Newsportal Development Company

Contacts

Office address – Sach Report, Building Number-1k10, Talwandi Kota (Rajasthan)
Mobile – 6378219602
Mail Us At: sachreport24@gmail.com

error: Content is protected !!